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 1 .सॉफ्टवेयर के मास्टर बन लाए घर में खुशहाली:-

आर्यन यादव का जन्म  प्रतापगढ़ के  कुंडा के किसान परिवार में हुआ था उनके घर के  सभी सदस्य बड़े होकर खेती में हाथ बढ़ाया करते थे मगर आर्यन इस परंपरा को आगे नहीं बढ़ाना चाहता था वे एक इंजीनियर बनने का सपना देखा करते थे लेकिन परिवार की हालत ऐसी नहीं थी कि इंजीनियरिंग का खर्चा उठा सके जैसे तैसे आर्यन ने सरकारी स्कूल से पढ़ाई पूरी की  उसके बाद  प्रयागराज के जीआईसी स्कूल से 12th के परीक्षा पास की

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संघर्षों से भरा रहा  जीवन:-

12th  तक आतेेेेे जाते  आर्यन के सामने सबसेे बड़ी चुनौती आर्थिक मुश्किलों को  हल करने की थी ऐसेे में उनके दिमाग में मछली पालन से लेकर फसल का उत्पादन  दोगुना करने के लिए ट्रैक्टर खरीदनेेेेे जैसे ख्याल  आने लगे लेकिन जब पता चला कि  इसके लिए कम से कम  50,000 रुपए की जरूरत होगी  तो उन्हें अपना सपना बंद होता हुआ सा नजर आने लगा स्थितियां उनकी समझ से परे थी पर आगेेेे बढ़ने का  सपना दिल से पक्का हो चुका था परिवार की माली हालत सुधारने का जब कोई विकल्प सामनेे नहीं  आया तो अमित ने खुद को  उस स्थिति से   दूर करने के लिए वह दिल्ली की ओर रवाना हो गए दिल्ली  पहुंचकर  आर्यन को जल्दी ही एहसास हो गया कि वह इंजीनियरिंग की डिग्री का खर्चा  नहीं उठा पाएंगे ऐसे में Ve पार्ट टाइम  ट्यूशन लेने लगे  साथ ही उन्हें दिल्ली  विश्वविद्यालय से B.A.की पढ़ाई शुरू कर दी

 अंग्रेजी बनी रास्ते का कांटा :-

 पढ़ाई के दौरान  आर्यन को महसूस हुआ कि उन्हें कंप्यूटर सीखना चाहिए। इसी मकसद  से साथ वे दिल्ली के एक प्राइवेट कंप्यूटर ट्रेनिंग सेंटर पहुंचे। सेटर की रिसेप्निस्ट ने जब  आर्यन से अंगरेजी में सवाल किये, तो वह जवाब में कुछ नहीं बोल पाये, क्योंकि अंगरेजी में भी उनके हाथ तंग थे। रिसे्निस्ट ने उन्हें प्रवेश देने से इनकार कर दिया। उदास मन से लौट रहे  आर्यन के चेहरे पर निराशा देख कर बस में बैठे एक यात्री ने उनकी उदासी का कारण जानना चाहा । वजह का खुलासा हुआ तो उसने  आर्यन को इंगलिश स्पीकिंग कोर्स करने का सुझाव दिया।  आर्यन को यह सुझाव अच्छा लगा और बिना देर किये तीन महीने का कोर्स ज्वॉइन कर लिया। कोर्स पूरा होने के बाद अमित में एक नया आत्मविश्वास जाग चुका था। उसी आत्मविश्वास के साथ  आर्यन को फिर से कप्यूटर ट्रेनिंग इंस्टीटयूट पहुंचे और प्रवेश पाने में सफल हो गये। अब आर्यन को दिशा मिल गयी थी। छह महीने के कंप्यूटर कोर्स में उन्होंने टॉप किया ।  आर्यन की इस उपलब्धि को देखते हुए इंस्टीटयूट ने उन्हें तीन वर्ष का प्रोग्राम ऑफर किया। प्रोग्राम पूरा होने पर इंस्टीटयूट ने उन्हें फैकल्टी के तौर पर नियक्त कर लिया। वहां पहली सैलरी के रूप में उन्हें 500 रूंपये मिले।

बचत से शुरू किया आइसोट:-

बचत से शुरू किया आइसोट कुछ वर्ष काम करने के बाद  आर्यन को Institute से एक प्रोजेक्ट के लिए इंग्लैंड जाने का अफर मिला, लेकिन  आर्यन ने जाने से इनकार कर दिया। वजह थी मन में अपना कारोबार करने की इच्छा। उस समय  आर्यन की उम्र 22 वर्ष थी। कारोबार की इच्छा रखने वाले  आर्यन ने जॉब छोडने का फैंसला लिया। कुछ हजार रूपये की बचत से दिल्ली में एक  छोटी-सी जगह किराये पर ली और अपनी सॉप्टवेयर कपनी ‘आइसोट की। 2018 में इस शुरूआत से  आर्यन काफी उत्साहित थे, लेकिन मुश्किलें खत्म नहीं हुई थी। कुछ महीनों तक उन्हें एक भी प्रोजेक्ट नहीं मिला था। गुजारे के लिए वे जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिंटी में रात में 8 बजे तक पढ़ते और फिर रात मैं बैठ कर सॉपटवेयर बनाते। घीरे-धीरे समय बदला और  आर्यन की कंपनी को प्रोजेक्ट मिलने लगे। अपने पहले प्रोजेक्ट के लिए उन्हें 8000  रूपये मिले ।  आर्यन अपने संघर्ष के बारे में बताते हैं कि लैपर्टॉप खरीदने की  क्षमता नहीं थी, इसलिए कस्टमर को अपने सॉपटवेयर दिखाने के लिए वे पब्लिक बसों में। अपना सीपीयू साथ ले जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने माइक्रोसॉप्ट का प्रोफेशनल एग्जाम पास किया और इआरसिस नामक सॉपटवेयर डेवलप किया और उसे पेटेंट भी करवाया।

आइसॉफ्ट ने किया सिखडनी का रूख.... :-

अब  आर्यन के सपनों को उडान मिल चुकी थी।  2019 में उन्हें ऑस्टेलिया में एक सॉप्टवेयर फेयर में जाने का मौका मिला। इस अवसर ने उन्हें अंतराष्ट्रीय एक्सपोजर दिया। इससेप्रेरित होकर उन्होंने अपनी कपनी को सिडनी ले जाने का फैसला कर लिया। ‘आइसॉट' सॉपटवेयर टेकनोलॉजी ने कदम दर कदम आगे बढ़ते हुए तरक्की की। आज उसने ऐसे मुकाम को छू लिया, जहां वह 200 से ज्यादा कर्मचारीयों और दुनिया भर में कशीब 400 कस्टमर के साथ कारोबार कर रही है। इतना ही नहीं  13 करोड रूपये के सालाना टर्नओवर की इस कंपनी के ऑफिस सिडनी के अलावा, दुबई., दिल्ली और  प्रयागराज में भी स्थ्ित हैं।

 समाजिक जि्मेदारी पर दे रहे हैं जोर :-

इस ऊंचाई पर पहुंचने के बाद भी  आर्यन  यादव समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना नहीं भूले थे।  पिता की जिम्मेदारियों के बाद उन्होंने कुछ ऐसा करने का सोचा, जिस पर किसी भी पिता को गर्व हो। कहीं-न-कहीं उनके मन में अपने राज्य में शिक्षा के अवसरों की कमी का अहसास भी था। बस इसी अहसास ने उन्हें  जार्जटाउन में एक कॉलेज खोलने की प्रणा दी।  आर्यन ने वर्ष  2020 में यहां कॉलेज स्थापित किया और उसका नाम अपने पिता मोती लाल यादव के पर रखा-

 बढ़ा रहे हैं नेकी की ओर कदम

 आर्यन ने अपनी पहचान उन चुनिंदा लोगों में करवायी है, जो जीवन में एक सफल मृकाम पाने के बाद समाज को लौटाने के लिए सक्रिय रहते हैं। सालों पहलें जिस कमी के कारण  आर्यन को अपना राज्य छोड़ना पड़ा, आज उसी कमी को दूर करने के लिए वे प्रयासरत हैं।। करोडों रूपये के निवेश के साध वे अपने राज्य को एक शिक्षण संस्थान और सुपर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल का उपहार दे चुके हैं और बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए सरकार की मदद भी कर रहे हैं। समाज के लिए कुछ करने की प्रणा के बारे में बताते हुए  आर्यन कहते हैं कि हम सभी को अपने समाज के प्रति उतना ही जिम्मेवार होना चाहिए, जितने कि अपने परिवार के प्रति होते हैं। इसलिए समाज की भलाई की दिशा में कुछ करने के लिए जितना संभव हो, उतना प्रयास हम सभी को करना चाहिए।

2.कैशकरो: छोटे कस्बे की लड़की की सफलता का मिसाल :-

लखनऊ की 16 वर्षीय स्वाति को स्कॉलरशिप के जरिए सिंगापुर जाकर पढ़ने का मौका मिला था। एक  छोटे से. कस्बे के साधारण परिवार की इस लड़की को पता नहीं था कि यह उसके लिए बुलंदियों को छूने का मौका था। लंदन में पढ़ाई और नौकरी के दौरान कैशबैक कॉन्सेप्ट में स्वाति को बिजनेस आइडिया नजर आया जिसे उन्होंने भारत में कैशबैक वेबसाइट 'कैशकरो’ के रूर में लॉन्च करते हुए कामयाबी की नई मिसाल कायम की। अपनी 16 वर्षीय होनहार बेटी स्वाती को तरक्की का मौका देने के इच्छुक पिता ने उसे सिंगापुर एयरलाइन्स की स्कॉलरशिप के लिए आवेदन करने की सलाह दी।

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  इस स्कॉलरशिप के लिए ऐसे 24 भारतीय स्टूरेंटस चयनित होने याले थे जिन्होंने बारहबीं में 80 प्रतिशत से ज्यादा अंक हासिल किए थे।  लखनऊ जैसे  से शहर की स्वाति का विदेश जाकर पढ़ाई करने के ख्याल से घबराना लाजिमी था। लेकिन पिता की जिद के चलते स्वाति ने इसकॉलरशिप को लिए आवेदन किया और परीक्षा दी।  पढ़ाई में  कुशाग्र स्वाति का चयन हो गयालेकिन अब परिवार के लिए अब परिवार के लिए  इतनी कम उम्र में अपनी बेटी को  पढ़ाई के  लिए विदेश भेजने का फैसला लेना आसान नही था। अवसर की अहमियत को  समझते हुए ।फिर भी उन्होंने  स्वाति को सिंगापर भेजने का निर्णय लिया। इस स्कौॉलरशिप के जरिए Swati ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनोंमिक्स से ऑनर्स हन मैंथमेटिक्स   एंड इकोनॉमिक्स में दाखिला ले ।लिया। ग्रेजुएशन के दौरान  स्वाति ने गोल्डमैन साब्स में समर इंटर्नशिप ज्वाइन। इसी  इंटर्नशिप कंपनी ने उन्हें  जॉब ऑफर दे दिया डिग्री पुरी होने के बाद स्वाति मे कंपनी की । investment banking डिवीजन की  क्रेडिट स्ट्रक्चरिंग और सेल्स टीम को जोंडइन किया। चार साल बाद  स्वाति को executive ऑफिस में क्लाईंट एंगेजमेट और रिलेशनशिप्स की जिम्मेदारी‘संभालने के लिए कहा गया। सीनियर मैनेजमेट के साथ काम करके  स्वाति की कम्यूनिकोशन स्किल्स को तो धार मिली ही, खुन्होंने अपने अंदर एक नया  आत्मविश्वास भी पाया।। इसी काम के दौरान  उनकी दिल्चस्पी आंत्रप्रिन्योरशिप में जागी। ये ऐसा बिजनेस करना चाहती थीं जो ।एक नए आइडिया पर आधारित हो।  इसी विश्वास  के साथ  स्वाति नें अपना जोॉंब छोड दिया।अपने इस अनुभय के बारे में बताते हुए  स्वाति कहती हैं कि 'उस क्त मंदी का दौर था और ।'लोगों को नौकरी से निकाला जा रहा था. ऐसे में मेरे लिए खुद नौकरी छोडने का फौसला लेना काफी मश्किलु था ।'। 

कौसशबक को बनाया विजनेस आइडिया:-

 'नौकरी छोने के बाद बिचनेस आइडिया की तलाश करते हुए स्वाती ने देखा कि यूके मे कैशबैक का कॉन्सेपष्ट काफी फल-फूल रहा था।  स्वाति और उनके पति रोहन भी कौसबैक के ।लिए  यूके की वैबसाइट cuedko  का इस्तेमाल करते थे और इस कोसेप्ट को काफी दिलचस्पमानते थे। इस लोकप्रियता को देखते हुए स्वाति ने अपने पति रोहन भार्गव के साथ कौशबैक का कारोबार  शुरू करने का फैसला किया। दोनों ही फाइनेस बैकग्राउंड से थे इसलिए उन्होने। शुरुआत के  कुछ महीने कौसबैक इंडस्ट्री और -कोमर्स को अच्छी तरह से समझने पर खर्च ।किए  2011 में अपनी पहली यूके वेबसाइट पोरिंग पाउंडस शुरू की। स्वाति और रोहन ने वबसाइट् की शरुआत अपनी बचत से की और करीब 7500 डॉलर के फडस का इंतजाम किया।।

 पोरिंग  पाउंड्स से कैशकरो:-

 कंज्यमर्स को बचत का विकल्प देने के लिए समर्षित पोरिंग पाउंडस को युके में काफी पसंद किया जाने लगा। कुछ ही time  में इस येबसाइट से टेस्को, डबेनहैम्स, एमाएंडएस, एकसपीडिया ।और आगोस  जैसे तकरीबन 2500 लोकीप्रिय ब्रांडउस जड गए। वेबसाइ की सफलता से उत्साहित होकर स्वाति अपने कारोबार को विस्तार देने के बारे में सोचने लगीं। इसी दौरान उन्होंने देखा कि भारत में कैशबैक के कॉन्सेप्ट के लिए काफी स्कोप है। इस संभावना को देखते हुए  स्वाति ने कैशबैक की अवधारणा को भारत लाने का फैसला किया। विस्तार के प्लान को हकीकत में बदलते हुए स्वाती ने 2013 में कैशकरो डॉट कॉम लॉन्च कर दी।

कम वक्त में बड़ा मुकाम :-

अपनी शुरूआत के पहले ही साल में कैशकरो डॉट कॉम के कारोबार में 1000 प्रतिशत की दर से वृदधि हुई है। यही नहीं यह वेबसाइट देश की प्रमुख 500 ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए लगभग 15० करोड़ के रिटेल कारोबार का जरिया बनी। आज कैशकारो डॉट कॉम रोजाना 3000 से ज्यादा ट्रांजैक्सन को अंजाम देती है और अपने मेम्बर्स को 5 करोड़ रूपए से ज्यादा का कैशबैक दे चुकी है। येबसाइट की तरक्की से खुश स्वाति को पूरा यकीन है कि अगले दो वर्षों में कैशकारो 30 मिलियन dollar के रेवेन्यू के साथ सभी तरह के डिस्काउंट्स, ऑफर्स, बहुत  वाउचर आदि के लिए देश की सबसे बड़ी बेबसाइट का मुकाम हासिल कर लेगी।

राह में मिली चुनौतियां भी :-

कैशकरो की लॉन्चिंग से पहले स्वाति के लिए यह सुनिश्चित करना जरूरी था कि कैशबैक का कॉन्सेप्ट संभावित ई-रिटेलर पार्टनर्स अच्छी तरह से समझ पाएं क्योंकि तभी इसे कस्टमर्स तक पहुंचाया जा सकता है। इस प्रक्रिया में मित्रा,  जबांग पेटीएम, अमेजन जैसे ई-रिटेलर्स के साथ भागीदारी करने में करीब छह महीने का वक्त लगा। अपना अनुभव साझा करते हुए स्वाति कहती हैं कि हमें ऐसे प्रोसेसेज का इस्तेमाल करना था जिनसे रिटेलर्स से मिलने बाला कमीशन समय पर आ सके और कस्टमर्स को भी वक्त पर कैशबैक किया जा सके। इस दौरान हमने जो सावधानियां बरतीं और जो सबक सीखे उससे हमारे कस्टमर्स की संख्या और पार्टनर बेस में इजाफा होने में मदद मिली है। आज रिटेलर्स हमसे जुड़ने के लिए खुद संपकी करते है। स्वाति का मानना है कि चुनौतियां भले ही मंजिल को मुश्किल बनाती हैं, लेकिन उनसे मिलने वाला अनुभव सफलता के नए कीर्तिमान बनाने में मददगार साबति होता है

Hintme  पूरी कोशिश रहती है कि आपको अच्छी अच्छी कहानियां और जानकारियां दें


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